देश के दिल मध्य प्रदेश की धरती से नाना का खासा कनेक्शन रहा.. भारतीय सिनेमा के दमदार अभिनेता नाना पाटेकर के निधन से पर्दे का एक बेबाक अध्याय खत्म हो गया। 8 अक्टूबर की सुबह 75 वर्ष की उम्र में नाना ने अंतिम सांस ली। लेकिन उनकी आवाज और अभिनय की आखिरी झलक अभी बाकी है, उनकी आखिरी बताई जा रही फिल्म ‘शक्ति शालिनी’, जिसकी शूटिंग मध्यप्रदेश के ग्वालियर, दतिया और मुरैना के इलाकों में हुई है, उसका आना अभी बाकी है जिसका सीधा कनेक्शन MP से है।
नाना पाटेकर का मध्यप्रदेश से पुराना रिश्ता है, ‘राजनीति’ की शूटिंग के लिए वे भोपाल आए थे, लेकिन वह स्टार’ बनकर नहीं, ‘अपना’ बनकर आए थे, खास बात यह है कि नर्मदा के ग्रामीणों की यादों में उनकी मुलाकात आज भी जिंदा है। बॉलीवुड अभिनेता नाना पाटेकर करीब तीन दशक पहले वे नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान डूब प्रभावित ग्रामीणों से मिले थे और उनकी सादगी आज भी याद की जाती है। फिल्मी पर्दे पर दमदार अभिनय और संवाद अदायगी से अलग पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर का एक चेहरा ऐसा भी था, जो कैमरे की चकाचौंध से दूर आम आदमी के दर्द को महसूस करता था। गुरुवार को उनके निधन की खबर ने देशभर में उनके प्रशंसकों को शोक में डुबो दिया, लेकिन नर्मदा घाटी के उन लोगों के लिए नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे। करीब तीन दशक पहले जब वे सरदार सरोवर डूब प्रभावितों के बीच पहुंचे थे, तब ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी पीड़ा सुनी थी।
ग्रामीणों की पीड़ा सुन भावुक हो गए थे नाना
नाना ने किसी बड़े सितारे की तरह औपचारिक मुलाकात नहीं की। वे ग्रामीणों के बीच अपनेपन से बैठे और बात की। साततलाई के सूरज पूछा था कि यहां कितने परिवार डूब से प्रभावित हैं। ग्रामीणों ने जब अपने घर और खेत छिनने की पीड़ा बताई तो नाना भावुक हो गए थे। उनकी सादगी ने लोगों को इस कदर प्रभावित किया था कि वर्षों बाद भी लोग उस मुलाकात को याद करते हैं। साल 1996 में नाना पाटेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर के साथ छोटी कसरावद (बड़वानी) पहुंचे थे। मनावर और कुक्षी तहसील क्षेत्र के कई गांवों के लोग उनसे मिले। साततलाई, गांगली, चिखल्दा, नर्मदा नगर और निसरपुर के ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि किस तरह डूब के कारण उनकी खेती, घर और जीवन की पूरी व्यवस्था संकट में आ गई है।
ग्रामीणों के बीच स्टार नहीं, अपना बनकर आए नाना पाटेकर की यही सादगी उस दौर में नर्मदा पट्टे के लोगों के दिल में उतर गई थी। वे अभिनेता होकर भी ग्रामीणों के बीच अपने व्यक्ति की तरह मिले थे। वे किसानों, मजदूरों और गरीबों की परेशानियों को लेकर लगातार संवेदनशील रहे। नर्मदा के डूब प्रभावितों के बीच करीब 30 साल पहले बिताया समय आज उनकी स्मृति का ऐसा हिस्सा बन गया है, जिसे लोग नहीं भूल पाएंगे।
कार्डियक अरेस्ट से हुआ निधन
जानकारी के लिए बता दें कि बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को निधन हो गया। वह 75 साल के थे। मेडिकल टीम जब उनके घर पहुंची तो एक्टर बेहोश मिले। उन्हें अस्पताल लाया गया, जहां तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। मणिपाल अस्पताल में डॉक्टरों ने सुबह 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया। उन्हें बचाने के लिए करीब 45 मिनट तक लगातार सीपीआर दिया गया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। नाना को अपने अभिनय के साथ, सामाजिक सरोकारों और किसानों के लिए किए गए काम को लेकर भी याद किया जाएगा। नाना चले गए… लेकिन चंबल की धरती पर फिल्माया उनका आखिरी किरदार 2027 में फिर पर्दे पर उनकी आवाज सुनाएगा।
निमाड़ जंक्शन परिवार की ओर से एक बेबाक कलाकार को सलाम।